एक सिरहन सी हुई थी, 19 की शाम को,
रूह से पुकारा था एक अनजान से नाम को।
नज़र किया जहां अपना उस मरासिम पर हमने,
पर आज बस धुआं ही है, 19 की शाम को।

फिर ख़ानाबदोशी का सा आलम छाया था।
उसके ज़िक्र से कुछ वक़्त मैं हिचकिचाया था।
धूल जम रही है उसकी यादों के बक्से पर अब,
बनाने में जिन यादों को सब कुछ गवाया था।

ना रही उसकी तड़प,
ना कोई कसक ही बाकी है।
था कभी नशा तेरा,
ना अब तू मेरा साक़ी है।

याद है तो बस वो सिरहन जो उठी थी 19 की शाम को।
पर आज बस धुआं ही है, 19 की शाम को।

For that evening of nineteen (19), over a decade back. When a young college kiddo expressed himself to his love interest. It flourished & violins were played. 

But change is the only constant. Humans ain’t immune to this.  The bond died.

What’s being cherished in this pain is the tingling emotion by that kiddo. It was love. What if it didn’t materialise. Celebration is for that “it happened”.

Glossary:

मरासिम = relation

ख़ानाबदोशी = vagrancy, homelessness

साक़ी = who serves alcohol, wine-server