हुए जो मुख़ातिब फिर

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ना आयी कोई आवाज़ तेरी, ना थामा मेरा हाथ।

पराया हुआ वो आशियां, जो साझा तेरे साथ।

हुए जो मुख़ातिब फिर, तो ख़ामोश ही रहूंगा।

ख़ामोश था तेरी चौखट पर, अब क्या कहूंगा?

This talks about someone who is leaving his beloved after being ruled out as a heartless fellow.
A circumstance where stepping out of house is stepping out of each others’ lives.

वफ़ा का ज़हर

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शिद्दत से छाया था ख़ुमार इक हसीं का,

बादस्तूर चला था सुरूर नाज़नीं का.

इक रोज़ ज़हर दिया, उसने इश्क़ के नाम से,

आज भी चखता हूँ, स्वाद उस करीम का.

When someone suggests to fall in love and enjoy it. saying, “asal zindagi mein bhi kr k dekho….alag maza hai iska” (try to fall for it in reality, it has its own charm).

I replied, “Been there, done that, not again”

अरसा हुआ…

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अरसा हुआ तुझे नज़रें चुराये,

बहरहाल, चाय के प्याले में तेरा ही अक्स है.

पर

मयस्सर नहीं अब हमसे आंखें चार करना,

ना तेरे इंतज़ार में आज ये शख्स है.

Its been a while since then. You do invade my dreams, but not my soul. Anymore.

मोहब्बत ना कर

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इतनी मोहब्बत ना कर ऐ ज़माने,

कितनी लम्बी है ये रात, कौन जाने?

मायूसियां छा जाएँगी तेरी तन्हाईयों में,

इसका इल्म है तुझे, तू माने.. ना माने.