19 की शाम

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एक सिरहन सी हुई थी, 19 की शाम को,
रूह से पुकारा था एक अनजान से नाम को।
नज़र किया जहां अपना उस मरासिम पर हमने,
पर आज बस धुआं ही है, 19 की शाम को।

फिर ख़ानाबदोशी का सा आलम छाया था।
उसके ज़िक्र से कुछ वक़्त मैं हिचकिचाया था।
धूल जम रही है उसकी यादों के बक्से पर अब,
बनाने में जिन यादों को सब कुछ गवाया था।

ना रही उसकी तड़प,
ना कोई कसक ही बाकी है।
था कभी नशा तेरा,
ना अब तू मेरा साक़ी है।

याद है तो बस वो सिरहन जो उठी थी 19 की शाम को।
पर आज बस धुआं ही है, 19 की शाम को।