गुस्ताखियाँ मेरी

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गुस्ताख़ होने से मेरे, रुस्वा तो हुआ ज़माना.

पर तन्हाइयों में सिसकियों का सबब, सूझता भी ना था.

कब तक शिरक़त करते लहू-लुहान दिल के जनाज़े में?

जनाज़े तक में, तकब्बुर से कोई चूकता भी ना था.