वफ़ा का ज़हर

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शिद्दत से छाया था ख़ुमार इक हसीं का,

बादस्तूर चला था सुरूर नाज़नीं का.

इक रोज़ ज़हर दिया, उसने इश्क़ के नाम से,

आज भी चखता हूँ, स्वाद उस करीम का.

कुछ देर ठहर

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रुस्वा तो तूने करना ही है, कुछ देर तो ठहर।

बा-दस्तूर वस्ल-ए-यार मुमक़िन नहीं, कुछ देर तो ठहर।

जुदाई का आलम अगले मोड़ से है झाँक रहा,

झपक भर का ये साथ छीन नहीं, कुछ देर तो ठहर।

तुझे जाने को कहा

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ख़ता मैंने की या सितम मुझ पर हुआ,

तुझे जाने को कहा.. तू लौट कर ना आया.

तेरे जाने का ग़म भी क्या करुँ?

जो लौटा ही नहीं, वो कहाँ मेरा साया?

When u ask her to go away for she doesn’t deserve a jerk like you and she does go away.

अरसा हुआ…

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अरसा हुआ तुझे नज़रें चुराये,

बहरहाल, चाय के प्याले में तेरा ही अक्स है.

पर

मयस्सर नहीं अब हमसे आंखें चार करना,

ना तेरे इंतज़ार में आज ये शख्स है.